हमसे भूल हो गई ...-मुकेश जोशी (नईदुनिया अधबीच में प्रकाशित)
पचास के दशक में विरहिणी नायिका द्वारा की गई ये
मार्मिक अपील----"भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना..ज़माना खराब है भुला नहीं देना
...." |
आज तक भी हम हिन्दुस्तानियों की भूलने बेकार आदत को सुधर
नहीं पाई है, हम हर बात भूलने में माहिर
हैं| "भूल गया"
हमारा राष्ट्रीय जुमला सा बन कर रह गया है| हम हमेशा बेकार की बातें याद रखते हैं, और काम की तथा जरूरी बातें, अक्सर भूल जाया करते हैं|
दरअसल ये भूलने की आदत हमें बचपन से ही पड जाती है| जब परीक्षाओं में घर से रात-रात भर 'घोटा' (रट्टा) लगाने के बाद भी सुबह 'प्रश्न पत्र' सामने आते ही हम 'उत्तर' भूल जाते हैं, फिर 'जैसे तैसे' काम चलाकर डिग्री
हांसिल कर पाते हैं|
असल में भूलने की बीमारी से कोई भी अछूता नहीं
रहा| आज तक हम आप सभी, कमोबेश इस भूलने की बीमारी से ग्रस्त ही नहीं
त्रस्त भी हैं, ..यकीन नहीं आए तो आप एकदम से
किसी से भी उसका मोबाइल नंबर पूछ कर देख लीजिये, अगला एकबार तो अचकचा ही जाएगा|
किसी जमाने में जब लैंडलाइन या बेसिक 'दूरभाष यंत्र' हुआ करते थे, तो दूरभाष धारक को जमाने भर के नंबर मुंहजबानी याद होते थे और आज इस 'टुनटुना युग' में खुद ही के नंबर के लाले पड़े हुए हैं| दरअसल इस मोबाइल नामक खतरनाक यन्त्र ने इंसान की
याददाश्त को 'भुलाने' में अहम् योगदान दिया है....घरवाली घर से ताकीद
देकर भेजती है, कि आज पत्तागोभी मत
लाना..., घबराए पतिदेव सबसे
पहले पत्तागोभी ही पन्नी में पटकता है, और दूसरी बाकी चीजें भले भूल जाए चाहे घर जाकर
श्रीमतीजी के हाथों खुद को नजीब जंग क्यों न समझना पड़े ... |
खासकर क़र्ज़ या उधार लेकर भूल जाना हमारा ख़ास शगल
है, उधार लेकर भूल जाने में यही वजह है, कि बड़ी-बड़ी बैंकों का 'एनपीए' (डूबंत ऋण) हमारी देश की कुल जमा अर्थ व्यवस्था से ज्यादा बड़ा हो गया है.. अब बैंक वाले भले ही संपत्ति कुर्की के फोटो समेत नोटिस छापें या
नीलामी करवाएं.. कर्जा लेकर भूल जाने वाले का तो कुछ बनना बिगड़ना ही नहीं है, क्योंकि जो संपत्ति नीलाम होनी है, उसे तो पहले ही 'बंगे' लगाकर अगला भूल चुका है...|
भूलने में भी उधार के बाद सबसे ज्यादा भूलने की कोई चीज है, तो वे हैं 'वादे'. सच कहें तो वादे किये ही 'भूलने' के लिए जाते हैं...|
बाबा आदम के जमाने से वादों का इतिहास देख लें.. हमारे धर्मालु श्रद्धालुजन अपने भगवान/ ईश्वर से किये हुए वादे ही भूल जाते
हैं... बाद में खुद भगवान् भी भूल जाते हैं, कि किस सच्चे भक्त ने किस वक़्त क्या पेशकश की थी
और वे भी भक्त को 'भूल' जाते हैं|
किसी भी प्रेमी ने आज तक अपनी प्रेमिका को चाँद तारे तोड़ के नहीं लाकर दिए, करोड़ों प्रेमिकाओं के दिल के टुकड़े हज़ार हो गए हो...पर ये 'भुलावे वाला वादा' आज भी एक परंपरा सा बन गया है| चाहे सहगल के ज़माने से गाया जा रहा हो- "हम आस लगाए
बैठे हैं तुम वादा करके 'भूल' गए." जैसे प्रेम करने वालों के वादों का कभी भरोसा नहीं होता वे 'भूलने' के लिए ही होते हैं|
ऐसे ही हमारे 'कर्णधारों' के वादे भी सिर्फ और सिर्फ भूलने के लिए ही होते हैं..|.
कर्णधार जानता है, कि आज वादा कर अपना वोट पक्का कर लो... फिर अपने को कौन इससे काम पड़ना है... हमारे नेताओं की वोट लेकर 'जनता' को भूल जाने की बीमारी ने समूचे देश को अडसठ बरसों से गंभीर बीमार पटक दिया
है.... पर जनता भी बेचारी वोट देकर खुद को अपने हाल पर छोड़कर भूल जाती है, और उसके नेता को तो ये भी याद नहीं रहता कि उसने
कभी वोट लिए थे.... देश में एक पार्टी की अध्यक्ष तो ऐसी हैं कि भूल
गबोले में कहां के लिए लिखा भाषण चीख चीख कर कही ओर पढ़ आती
हैं.. और उपाध्यक्ष को गाँवों में जाकर रोटी खाने का शौक तो है, लेकिन बाद में 'वे' यह भी भूल जाते हैं कि उनके ही नाम वाले गांव में लोग घांस
की रोटी खाने को मजबूर हैं|
एक और बड़े वाले नेताजी हैं जो 'जाना था जापान पहुँच गए चीन' की तर्ज़ पर 'जाना था काबुल, पहुँच गए लाहौर' की भूल से सब तरफ हडकंप मचा
आये|
. . . और हमारे म्युन्सिपलिटी छाप एक 'दिल्लीवाल' नेताजी तो सुबह कही बात शाम को भूल जाते हैं, कहा जाता है कि विद्वान् लोग 'भुलक्कड़' होते हैं, इसीलिए उन्हें
भुलक्कड़ विद्वान् कहा जाता है|
...एक
साहित्यिक मित्र जिन्हें जमाने भर की बातें आंकड़ों सहित याद रहती हैं, पर किसी के घर उन्हें जाना हो तो शामत आ जाती है, किसी भी परिचित या रिश्तेदार के घर वे सीधे कभी
नहीं पहुँच पाते फिर 'टटूमे' खाते हुए जैसे तैसे पहुँचते है, और अपनी इस मासूम अदा पर खुद ही हँसते भी हैं|
...एक और मित्र इनसे भी 'बड़े वाले' साहित्यिक हैं, उन्हें तो बार खुद का घर भी नहीं मिलता.. भूल जाते हैं, इस गली में था कि उस गली में?
..जाहिर
है हर विद्वान् में छोटा-मोटा आइन्स्टीन फंसा हुआ ही रहता है| कभी किसी साहित्यिक समागम में फंस जाओ और कोई धुरंधर वक्ता 'एकालाप' कर रहा हो तो बीच में कही से कोई 'कमेन्ट' भी आते हैं .... तो वक्ता जी की 'लाइन लेंथ' बिगड़ जाती है, वे अपना बका हुआ 'भूलकर' नाक खुजाते हुए फिर 'शुरू से शुरू' होते हैं- "हाँ तो मैं कहां था...क्या कह रहा था...?"
फिर पीछे से फुसफुसाहट आती है- " आप
यहीं थे और हमारे प्राण ले रहे थे.."
आत्मीयजन अपने यहाँ होने वाले कार्यक्रमों में
अपने प्रियजनों को आमंत्रित करना नहीं भूलते ... किन्तु उनके नहीं आने पर अखरता जरूर है .. ऐसे ही एक आत्मीय ने
दूसरी बार कार्यक्रम रखा तो जो पहले आना 'भूल' गए थे उन्हें अबकी बार
आमंत्रित नहीं किया ... अगले ने उलाहना दिया- क्यों साहब हमको ही भूल गए ... आत्मीय ने सधा जवाब दिया - पिछली बार हमने बुलाया
तो आप आना भूल गए सो इस बार हम बुलाना 'भूल' गए...
-मुकेश जोशी,
८, मंगलम अपार्टमेंट,
वेद्नगर, उज्जैन 456010
99263-00973 लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक.
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