ये चलती ट्रेन में चढ़ने वाले-

ये चलती ट्रेन में चढ़ने वाले- मुकेश जोशी.
हम में  से हर किसी ने  ट्रेन से सफ़र तो  किया  ही है और जिन्होंने, दुर्भाग्य से नहीं किया, हो सकता है वे 'फ्लाइट मोड' में रहते रहे हो मगर वे रेलवे स्टेशन तो गए ही होंगे अपने किसी को छोड़ने या लेने बगैर प्लेटफॉर्म टिकिट के, उन सभी ने देखा होगा कि जब ट्रेन चलने को होती है तब कुछ लोग भागते-दौड़ते ही नहीं गिरते-पड़ते ही सही आखिर में ट्रेन के डिब्बे हत्था पकड़कर लटकने में कामयाब हो ही जाते हैं थोड़ी सी घबराहट के बाद नार्मल होते ही उनके चेहरे पर विजेता के से भाव आ जाते हैं उनका रिजर्वेशन है तो ठीक वरना वे अब "थोडा सरको पांच की सीट है" बोलते बोलते सीट की जुगाड़ में भिड जाते हैं और सीट मिलते ही उनका विजेता भाव डबल सेंचुरी टाइप का  हो जाता है. अब सहयात्रियों से बातचीत का दौर शुरू होता है. वे बड़े इत्मीनान से फरमाते हैं -" आज ट्रेन राईट टाइम पे चल दी के बिफोर टाइम ?" सहयात्री ठीक ठाक हुआ  तो ठीक जवाब दे देता है और कोई मसखरा फस गया तो जवाब मिलता है.."आप तो सही टाइम पे आये थे ये ट्रेन वाले को जल्दी थी तो पेले इ चला दी" लटकने वाले खिसियाकर चुप रह जाते हैं. करें भी क्या आदत से लाचार जो हैं. देश में हजारो ट्रेनों में लाखों यात्री रोज सफ़र करते हैं इनमे से हजारों लोग प्रायः चलती ट्रेन में लटकने का जोखिम उठाते हर प्लेटफॉर्म पर देखे जा सकते हैं. इस 'जोखिम भरे शॉट' में कई लोगों को 'जिंदगी की पारी से आउट' भी होना पड जाता है मगर ये चलती ट्रेन में चढ़ने की आदत नहीं जाती तो नहीं जाती. इंसानी जिन्दगी भी कमोबेश ट्रेन जैसी ही है जो अनवरत चलती रहती है इस स्टेशन से उस स्टेशन. पर इस चलती ट्रेन में चढ़ने वाले भी लाखोंमिलेंगे.नल-बिजली के बिल हों या टेलीफोन के हम  हमेशा आखिरी तारीख का ही इंतज़ार करते रहते हैं और उसमे भी अंतिम समय का तब जाकर लाइन में लगते हैं हम लोग. उधर खिड़की के अन्दर बैठे 'वसूली पटेल' का बाहर की लम्बी लाइन देखकर धैर्य चूकने लगता है वो मन ही मन और कभी कभी जोर से भी गालियाँ बकने लगता है- "बिल तो इत्ते दिन से भरा रिये हें पेले कां मर गए थे सब लोग एन टेम पे इ आ के ने छाती पे चढ़ जाते हो, हम भी घर जाएँ के नी, अरे हमारे भी बाल-बच्चे हैं के नी" उसका सारा गुस्सा उन चलती रेल में चढ़ने वालों पर उतरता है जो काउण्टर बंद होने की टाइम पर नमूदार होते हैं. यही हाल रोजगार के लिए आवेदन भरने वालों का होता है इनमे भी ज्यादातर लोग "आवेदन भेजने की अंतिम तिथि" का ही इंतज़ार करते रहते हैं भले ही अखबार में महीने भर पहले 'वेकेन्सी'  छप गई हो. अब आप ही सोचिये कि रोजगार के लिए आवेदन करने वाला तो 'नेठु इ नल्ला' रहता है,उसके पास कोई काम धाम तो रहता नहीं सिवाय चप्पल चटकाने के, वह चाहे तो पहले ही दिन आवेदन कर सकता है मगर हमारी जो चलती ट्रेन में चढ़ने की आदत है वह जाती नहीं लिहाजा हम बेरोजगार होते हुए भी आखिरी दिन अपने सारे दस्तावेज फोटोकॉपी करवाते हैं बैंक वाले की छाती पर खड़े होकर आखिरी दिन ही ड्राफ्ट/चालान बनवाते हैं और पोस्ट ऑफिस बंद होने के टाइम पर भागते दौड़ते वहां लाइन में लगते हैं जहां हमसे पहले भी हम जैसे कई लाइन में लगे होते हैं. साल भर हम मटरगश्ती करते हैं और एन परीक्षा वाले दिन किताब हाथ में लेकर पढने का नाटक करते हैं ऐसे हज़ारो बच्चों को देखता हूँ कि पेपर देने जाते वक्त भी रास्ते में गाइड पढ़ते रहते हैं और परीक्षा स्थल पर भी उन्हें पढ़ते देखा जा सकता है अरे साल भर क्लास में झींक लेते तो आज आखरी दिन इन फर्रों को नहीं पढना पड़ता. पर वो ही चलती ट्रेन में चढ़ने की आदतसे लाचार हम .  ऐसा ही कुछ स्कूल- कॉलेज की फीस या म्युन्सिपलिटी के टैक्स, सेल्स टैक्स, इनकम टैक्स भरते वक्त भी होता है. बापडे कर्जा देकर बैठे बैंक वालो के घर तो लोग चलती ट्रेन में चढ़कर भी नहीं आते. बैंक वालो को ट्रेन उनके घर लेकर जाना पड़ती है तब कहीं जाकर कर्जदार महाराज की सवारी " नी चढूं, नी चढूं" कहती हुई जैसे तैसे चढ़ानी पड़ती है. लिखने-पढने वालों का हाल भी कोई बेहतर नहीं है. शहर के एक प्रतिष्ठित स्तंभकार लेखक का ज्यादातर लेखन आटा चक्की पर ही हुआ है और एक समीक्षकजी तो हर कार्यक्रम में घंटे-दो घंटे लेट चलती ट्रेन में लटकते हुए इसलिए पहुचते हैं कि २ महीने पहले दी गई पुस्तक की भी वे 'गरमागरम' समीक्षा कार्यक्रम वाले दिन ही लिख लाते हैं और वो भी पुस्तक पढे बगैर. चलती ट्रेन में चढ़ने का मजा हमारे नेतागण जैसे लेते हैं वैसे तो कोई नहीं लेता. दादरी हो या हैदराबाद या फिर कोलकाता हमारा एक नेता गिरते पड़ते पहुँच ही जाता है जिससे दूसरे दिन मीडिया की सुर्खियाँ बन सकें कि गप्पू जी आज टूटा पुल देखने पहुंचे. ये और बात है कि उनकी ट्रेन उनके चढ़ते ही हर बार पटरी से उतर जाती है|

-मुकेश जोशी, ६१, मानसरोवर कॉलोनी, श्रीराम नगर के पीछे, उज्जैन ४५६०१०, 
 ०९९२६३-००९७३
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लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक. ============================================