"All Is Well" Satire (Vyang) collection by Shri Mukesh Joshi is Released.

"All Is Well" Satire (Vyang) collection by Shri Mukesh Joshi is Released. 
उज्जैन 19 मार्च 2017
पंडित राज शेखर व्यास, अपर महानिदेशक आकाशवाणी एवं दूरदर्शन महानिदेशालय दिल्ली के सारस्वत अतिथेय में, टेपा सम्मलेन उज्जैन के संस्थापक, मूर्धन्य व्यंगकार डॉ शिव शर्मा जोशी जी की अध्यक्षता में, सुप्रसिद्धव्यंगकार श्री यशवंत व्यास और उपायुक्त सहकारिता, डॉ मनोज जायसवाल के विशिष्ट आतिथ्य में कार्यक्रम के सूत्रधार, व्यंगकार श्री डॉ पिलकेंद्र अरोरा के चुटीले अंदाज भरे संचालन  के बीच श्री मुकेश जोशी के व्यंग लेख प्रकाशन  "आल इज़ वेल"  का आज साहित्य मंथन संस्था के महानुभावो एवं स्नेहीजनो के सानिध्य में विमोचन हुआ। 
पिछले कई वर्षो देनिक नई दुनिया में अधबीच स्तम्भ में समाज , व्यवस्था, परम्परा, आदि अनेक विषयों  हलके अंदाज में व्यंग वाण छोड़कर गुदगुदाते आये हें | 
इस ब्लोग पर भी 14 लेख बानगी के रूप में उपलब्ध हैं| देखें - व्यंग लेख 
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"यादवजी के दो आगे यादवजी , यादवजी के दो पीछे यादवजी " बोलो कितने यादवजी?

बोलो कितने यादवजी?
यादव जी ने यादव जी से अध्यक्ष पद छीनकर यादव जी को दे दिया..
यादव जी के इस फैसले से यादव जी नाराज़ हो गए..
नाराज़ यादव जी ने यादव जी से उनके विभाग छीन लिए..
और यादव जी के कुछ विभाग, यादव जी ने अपने पास रख लिए..
फिर यादव जी से, मुलाक़ात करने यादव जी, दिल्ली आ गए..
यादव जी, ने मुलाक़ात के लिए यादव जी को भी बुलाया..
लेकिन यादव जी से मिलने की बजाय, यादव जी लखनऊ में ही रह गए..
इधर यादव जी और यादव जी की मुलाक़ात करीब ढाई घंटे तक चली..
यादव जी से मुलाक़ात के बाद यादव जी ने कहा.. जो यादव जी कहेंगे यादव जी वही करेंगे..
फिर यादवजी ने यादव जी को ६ साल के लिए पार्टी से निकाल दिया,
 और ६ घंटे बाद यादव जी ने यादव जी को वापस बुला लिया
एक दिन बाद,
 यादव जी ने राष्ट्रिय अधिवेशन बुला कर यादव जी को पार्टी मार्गदर्शक बना दिया ,
यादव जी ने नाराज हो कर अधिवेशन को असंविधानिक घोषित कर दिया,
 और यादव जी के समर्थक यादव जी को फिर पार्टी से निकाल दिया ! 
ताज़ी खबर ये है की यादव जी ने यादव जी के ऑफिस पर कब्ज़ा कर लिया है 
और यादव जी के समर्थको ने यादव जी की नेमप्लेट हटा दी है !!
कुछ समझ में आया..
आ गया तो बताओ..
"यादवजी के दो आगे यादवजी , यादवजी के दो पीछे यादवजी "
बोलो कितने यादवजी ?
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लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक. ============================================

घाट पर तांक झांक -मुकेश जोशी

घाट पर  तांक झांक  -मुकेश जोशी
जब सारी दुनिया शाही स्नानके लिए कुम्भ नगरी की तरफ भाग रही हो, तो मैं यहीं का यही रहकर जनरल स्नान भी न कर पाऊं तो लानत है मुझपे?
शाही स्नान तो मैं कर नहीं सकता वो तो साधु-संतों का होता है, ऐसा सुना था मैंने या  फिर राजे रजवाड़ों का और जब शाहलोग ही दलित स्नानकी बात करने लगें तो अपना तो जनरल स्नान ही भला!
 लिहाजा अपने राम भी चल दिए बगल में गमछा दबा कर स्नान करने!

ये चलती ट्रेन में चढ़ने वाले-

ये चलती ट्रेन में चढ़ने वाले- मुकेश जोशी.
हम में  से हर किसी ने  ट्रेन से सफ़र तो  किया  ही है और जिन्होंने, दुर्भाग्य से नहीं किया, हो सकता है वे 'फ्लाइट मोड' में रहते रहे हो मगर वे रेलवे स्टेशन तो गए ही होंगे अपने किसी को छोड़ने या लेने बगैर प्लेटफॉर्म टिकिट के, उन सभी ने देखा होगा कि जब ट्रेन चलने को होती है तब कुछ लोग भागते-दौड़ते ही नहीं गिरते-पड़ते ही सही आखिर में ट्रेन के डिब्बे हत्था पकड़कर लटकने में कामयाब हो ही जाते हैं थोड़ी सी घबराहट के बाद नार्मल होते ही उनके चेहरे पर विजेता के से भाव आ जाते हैं उनका रिजर्वेशन है तो ठीक वरना वे अब "थोडा सरको पांच की सीट है" बोलते बोलते सीट की जुगाड़ में भिड जाते हैं और सीट मिलते ही उनका विजेता भाव डबल सेंचुरी टाइप का  हो जाता है. अब सहयात्रियों से बातचीत का दौर शुरू होता है. वे बड़े इत्मीनान से फरमाते हैं -" आज ट्रेन राईट टाइम पे चल दी के बिफोर टाइम ?" सहयात्री ठीक ठाक हुआ  तो ठीक जवाब दे देता है और कोई मसखरा फस गया तो जवाब मिलता है.."आप तो सही टाइम पे आये थे ये ट्रेन वाले को जल्दी थी तो पेले इ चला दी" लटकने वाले खिसियाकर चुप रह जाते हैं. करें भी क्या आदत से लाचार जो हैं. देश में हजारो ट्रेनों में लाखों यात्री रोज सफ़र करते हैं इनमे से हजारों लोग प्रायः चलती ट्रेन में लटकने का जोखिम उठाते हर प्लेटफॉर्म पर देखे जा सकते हैं. इस 'जोखिम भरे शॉट' में कई लोगों को 'जिंदगी की पारी से आउट' भी होना पड जाता है मगर ये चलती ट्रेन में चढ़ने की आदत नहीं जाती तो नहीं जाती. इंसानी जिन्दगी भी कमोबेश ट्रेन जैसी ही है जो अनवरत चलती रहती है इस स्टेशन से उस स्टेशन. पर इस चलती ट्रेन में चढ़ने वाले भी लाखोंमिलेंगे.नल-बिजली के बिल हों या टेलीफोन के हम  हमेशा आखिरी तारीख का ही इंतज़ार करते रहते हैं और उसमे भी अंतिम समय का तब जाकर लाइन में लगते हैं हम लोग. उधर खिड़की के अन्दर बैठे 'वसूली पटेल' का बाहर की लम्बी लाइन देखकर धैर्य चूकने लगता है वो मन ही मन और कभी कभी जोर से भी गालियाँ बकने लगता है- "बिल तो इत्ते दिन से भरा रिये हें पेले कां मर गए थे सब लोग एन टेम पे इ आ के ने छाती पे चढ़ जाते हो, हम भी घर जाएँ के नी, अरे हमारे भी बाल-बच्चे हैं के नी" उसका सारा गुस्सा उन चलती रेल में चढ़ने वालों पर उतरता है जो काउण्टर बंद होने की टाइम पर नमूदार होते हैं. यही हाल रोजगार के लिए आवेदन भरने वालों का होता है इनमे भी ज्यादातर लोग "आवेदन भेजने की अंतिम तिथि" का ही इंतज़ार करते रहते हैं भले ही अखबार में महीने भर पहले 'वेकेन्सी'  छप गई हो. अब आप ही सोचिये कि रोजगार के लिए आवेदन करने वाला तो 'नेठु इ नल्ला' रहता है,उसके पास कोई काम धाम तो रहता नहीं सिवाय चप्पल चटकाने के, वह चाहे तो पहले ही दिन आवेदन कर सकता है मगर हमारी जो चलती ट्रेन में चढ़ने की आदत है वह जाती नहीं लिहाजा हम बेरोजगार होते हुए भी आखिरी दिन अपने सारे दस्तावेज फोटोकॉपी करवाते हैं बैंक वाले की छाती पर खड़े होकर आखिरी दिन ही ड्राफ्ट/चालान बनवाते हैं और पोस्ट ऑफिस बंद होने के टाइम पर भागते दौड़ते वहां लाइन में लगते हैं जहां हमसे पहले भी हम जैसे कई लाइन में लगे होते हैं. साल भर हम मटरगश्ती करते हैं और एन परीक्षा वाले दिन किताब हाथ में लेकर पढने का नाटक करते हैं ऐसे हज़ारो बच्चों को देखता हूँ कि पेपर देने जाते वक्त भी रास्ते में गाइड पढ़ते रहते हैं और परीक्षा स्थल पर भी उन्हें पढ़ते देखा जा सकता है अरे साल भर क्लास में झींक लेते तो आज आखरी दिन इन फर्रों को नहीं पढना पड़ता. पर वो ही चलती ट्रेन में चढ़ने की आदतसे लाचार हम .  ऐसा ही कुछ स्कूल- कॉलेज की फीस या म्युन्सिपलिटी के टैक्स, सेल्स टैक्स, इनकम टैक्स भरते वक्त भी होता है. बापडे कर्जा देकर बैठे बैंक वालो के घर तो लोग चलती ट्रेन में चढ़कर भी नहीं आते. बैंक वालो को ट्रेन उनके घर लेकर जाना पड़ती है तब कहीं जाकर कर्जदार महाराज की सवारी " नी चढूं, नी चढूं" कहती हुई जैसे तैसे चढ़ानी पड़ती है. लिखने-पढने वालों का हाल भी कोई बेहतर नहीं है. शहर के एक प्रतिष्ठित स्तंभकार लेखक का ज्यादातर लेखन आटा चक्की पर ही हुआ है और एक समीक्षकजी तो हर कार्यक्रम में घंटे-दो घंटे लेट चलती ट्रेन में लटकते हुए इसलिए पहुचते हैं कि २ महीने पहले दी गई पुस्तक की भी वे 'गरमागरम' समीक्षा कार्यक्रम वाले दिन ही लिख लाते हैं और वो भी पुस्तक पढे बगैर. चलती ट्रेन में चढ़ने का मजा हमारे नेतागण जैसे लेते हैं वैसे तो कोई नहीं लेता. दादरी हो या हैदराबाद या फिर कोलकाता हमारा एक नेता गिरते पड़ते पहुँच ही जाता है जिससे दूसरे दिन मीडिया की सुर्खियाँ बन सकें कि गप्पू जी आज टूटा पुल देखने पहुंचे. ये और बात है कि उनकी ट्रेन उनके चढ़ते ही हर बार पटरी से उतर जाती है|

-मुकेश जोशी, ६१, मानसरोवर कॉलोनी, श्रीराम नगर के पीछे, उज्जैन ४५६०१०, 
 ०९९२६३-००९७३
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लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक. ============================================

मोक्ष मांगती मोक्षदायिनी - मुकेश जोशी

मोक्ष मांगती  मोक्षदायिनी
        मुकेश जोशी

उज्जयिनी की जीवन रेखा 'क्षिप्रा' नदी को वेद-पुराण-शास्त्रों में मोक्षदायिनी कहा गया है| जब पोथी-पुराणों में कहा गया है, तो हमें तो मोक्षदायिनी मानना ही पड़ेगा न|

देश मांगे आज़ादी -मुकेश जोशी

 देश मांगे आज़ादी -मुकेश जोशी

 पूरे साढे अडसठ साल हो गए आज़ादी मिले को, पर हमारा देश आज भी आज़ादी मांग रहा है|
टीवी पर रिसालों में, नेट पर, मोबाइल में हर किसी को आजादी  की दरकार है, हर कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा मुंह उठाए मुट्ठी बांधे आजादी-आजादी चिल्ला रहा है|

हमसे भूल हो गई ...मुकेश जोशी,

हमसे भूल हो गई ...-मुकेश जोशी (नईदुनिया अधबीच में प्रकाशित)

पचास के दशक में विरहिणी नायिका द्वारा की गई ये मार्मिक अपील----"भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना..ज़माना खराब है भुला नहीं देना ...."  |
आज तक भी हम हिन्दुस्तानियों की भूलने बेकार आदत को सुधर नहीं पाई है, हम हर बात भूलने में माहिर हैं| "भूल गया" हमारा राष्ट्रीय जुमला सा बन कर रह गया है| हम हमेशा बेकार की बातें याद रखते हैं, और काम की तथा जरूरी बातें, अक्सर भूल जाया करते हैं|
दरअसल ये भूलने की आदत हमें बचपन से ही पड जाती है| जब परीक्षाओं में घर से रात-रात भर 'घोटा' (रट्टा) लगाने के बाद भी सुबह 'प्रश्न पत्र' सामने आते ही हम 'उत्तर' भूल जाते हैं, फिर 'जैसे तैसे' काम चलाकर डिग्री हांसिल कर पाते हैं|