घाट पर तांक झांक -मुकेश जोशी

घाट पर  तांक झांक  -मुकेश जोशी
जब सारी दुनिया शाही स्नानके लिए कुम्भ नगरी की तरफ भाग रही हो, तो मैं यहीं का यही रहकर जनरल स्नान भी न कर पाऊं तो लानत है मुझपे?
शाही स्नान तो मैं कर नहीं सकता वो तो साधु-संतों का होता है, ऐसा सुना था मैंने या  फिर राजे रजवाड़ों का और जब शाहलोग ही दलित स्नानकी बात करने लगें तो अपना तो जनरल स्नान ही भला!
 लिहाजा अपने राम भी चल दिए बगल में गमछा दबा कर स्नान करने!

 कथा-कहानियों, वेद पुराणों, शास्त्रों में लिखा होगा (भईया अपन ने तो नी पढ़े) कि पवित्र नदियों में स्नान करने से मन का मैल धुल जाता है| आत्मा शुद्ध हो जाती है| सोचा अपन भी आत्मा को पवित्र कर लें एक डुबकीलगाकर| वरना तो अपन ने जीवन भर फिसल पड़े तो हर गंगेवाला दृष्टांत ही माना है| सामने कोई मंदिर-शिवाला-मजार पड़ जाए तो अकड़ी हुई गर्दन को हलकी सी नरमाई देते हुए झुकाओ, भगवान् पर एहसान करो और आगे बढ़ लो उसी रफ़्तार में, जैसा हम अपने परिचितों के साथ रोज सड़कों पर करते हैं|
हां तो बात स्नान की चल रही थी| स्नान का भी ऐसा ही है करोड़ों की उम्मीद करो तो लाखों की आत्मा जागती है, कि चलो अपनी अशुद्ध आत्मा को डुबकी मारकर शुद्धिकृत का रिचार्जकरवा आएं| सरकारें हज़ारों करोड़ खर्च कर करोड़ों लोगों के मन के मैल की चकाचक धुलाई का ठेका ले लेती हैं| ये अलग बात है, कि ये ही सरकारें पब्लिक के मैले मनों को शुद्ध करने वाली पवित्र नदियोंके शुद्धिकरण का बीड़ा उठाती हैं| मतलब पेले नद्दी शुद्ध करो तब जा के ने  वो लोगों को शुद्ध करेगी|
असल में हम हिन्दुस्तानी लोग हैं ही इतने मलिन कि खुद शुद्ध होने की बजाय पवित्र नदियों को गन्दा करके चले आते हैं| यदि ऐसा न होता तो राजकपूर साहब राम तेरी गंगा मैलीक्यों बनाते और ये गाना ही क्यों बनता राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते”|
जाहिर है मोक्ष्दायिनियों के पुण्य पर हमारे पापभारी हैं| और जो हम पापी न हों तो काहे को तीरथ, बरत, स्नान, कथा करते फिरें|
दरअसल ये इंसान नाम का जो इकलौता प्राणी है, उसमे भी खासकर हम सनातनधर्मी ही जरूरत से ज्यादा पाप-पुण्य के चक्कर में पड़े रहकर देवी-देवता, ज्योतिष कर्मकांड, तंत्र-मन्त्र-यंत्र, बाबाजियों से चकरघिन्नी होते रहते हैं| फिर इन तमाम धतकरमों के बाद भी न तो नदियाँ शुद्ध हो पा रही हैं, न लोगों की आत्मा|

यदि स्नान’  से ही पाप धुलते तो नदियों के घाटों पर चोर-उठाईगीरों का बसेरा न होता| मोक्षदायिनी के घाट पर आये सैकड़ों श्रद्धालुओं के मन साफ़ हुए या नहीं ये पता नहीं चल सका लेकिन उनकी जेबें, कपडे, बटुए जरूर साफ़ हो गए| कई श्रद्धालु तो बापडे आये तो बड़े झांकी में कपड़ों में सज-धज कर लेकिन यहाँ से लौटे तो नागाहोकर| बेचारों के कपडे तक नहीं छोड़े उठाईगीरों ने|
हर रोज चोरियां हो रही हैं| आम जनता को ही नहीं बाबाजीतक को चोट्टे बड़े बाबाजीबना रहे है| मगर यहाँ की पुलिस महज आम लोगों को चमका-धमका के उनपे लाठी भांज रही है| मजे की बात ये है, कि पुलिस की निगाह नदी में शुद्ध हो रहे श्रद्धालुओं पर है, और चोर-गैंग की घाट पर पड़े सामान पर| पुलिस चोरों को इसलिए नहीं पकड़ पा रही कि चोट्टों ने तो घाट घाट का पानीपी रखा है और पुलिस सिर्फ एक घाट पर खडी है, वो भी एक टांग पर|
एक टांग पर तो उठाईगीरे भी खड़े हैं, मगर वे बगुला दृष्टिके साथ मछली दिखी नही कि चोंच में चबद ली - बैग,पर्स, कपडे दिखे कि गायब|
यूँ घाट पर उद्घोषक भी बार बार चेता रहा है, कि गहरे पानी में  न उतरें, स्नान कर लिया हो तो तुरंत बाहर आ जाएँ, अगले स्नानार्थियों को  भी अवसर दें, मगर इस देश की मिटटी पानी का ही कुछ ऐसा असर है, कि जो एक बार जगह पा गया अगले को कभी अवसर देना ही नहीं चाहता|
मामला चाहे सत्ता की कुर्सी हो या दफ्तर की कुर्सी का, और अब तो साधु भी गद्दी के लिए बन्दूक तलवार चला रहे हैं| उद्घोषक समझा भी रहा है, कि आप ५ मिनिट स्नान करेंगे तो भी उतना ही पुण्य मिलेगा जितना १ घंटे तक नहाते रहने पर मिलेगा,अतः आप अगलों को भी पुण्य कमाने का अवसर दें|
 पर बात तो येई है नी के अगला कैसे पुण्य कमा ले, हम छोड़ेंगे तभी तो कमाएगा न| नदी भले ही बाद में शुद्ध हुई हो हमारे इंजीनियरों-ठेकेदारों ने पूरी नदी को घाटों से पाट कर सारा पुण्यखुद के खातों में डलवा लिया| अगले कुम्भ में ये घाट फिर बनेंगे उस वक़्त के जिम्मेदारों के पुण्यकी खातिर जैसे इस बार ये घाट कचकड़े या पुट्ठे के बने हों| बहरहाल उद्घोषक लगातार बोल रहा है कि आप लोग अपने सामान की सुरक्षा खुद करें, यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है| पर लोग रोज लुट-पिट ही रहे हैं फिर रोते कलपते पुलिस के पास जा रहे हैं| पुलिस बोलती है- हमने तो पेले इ कई थी| हम का एक एक के सामान की निगरानी करते फिरें| उद्घोषक चिल्ला रहा है- घाट पर स्नान करने वालों के अलावा और कोई फालतू खड़ा न रहे| इधर उधर फालतू तांक-झांकन करें|
घाट पर पुरुषों से ज्यादा महिलायें-युवतियां हैं, वे हो तो तांक झांक तो होगी ही | हमारी आदत जो पड़ी हुई है| घाट स्नानार्थियों से ज्यादा तांक-झांककरने वालों से भरे पड़े हैं| और अब तो तांक-झांककरने वालों के पास स्मार्ट टुनटुना जो आ गया है| सारी तांक झांक क्लिक और वायरल हो रही है घाट पर से ही| इन तांक-झांक करने वालों को पुलिस घाट से इसलिए भी नही हटा पा रही कि खुद जवान इसी स्मार्ट फ़ोन के साथ घाट पर ही मुस्तैदहैं| बेचारे उद्घोषक को कौन समझाए कि तेरे  बोलने से हम तांक-झांक करना नहीं छोड़ सकते| तांक-झांक दरअसल हमारी आदत नहीं संस्कृति है, कल्चर है| अपने घर की बजाय हम पडोसी के घर में ज्यादा झांकते हैं| अपने सपूत-सपूतनियों पर निगाह रखने की बजाय अपने रिश्तेदार, परिचित के बेटे-बेटी क्या गुल खिला रहे हैं, हम रस ले लेकर बताते हैं| इधर एक आदमी को सारी दुनिया की डिग्रीयां झाँकने को चाहिए, तो उधर हेलिकॉप्टर की तांक-झांक इटली तक पहुँच चुकी है|
सारे शंकराचार्य दूसरों को फर्जी बता रहे हैं, शायद ये सब भी दिल्लीसे डिग्री लेकर आये हैं| इन साधु-संतों को मोह-माया से क्या लेनादेना| जगत मिथ्या, शंकराचार्यजी ने कहा था| ये लोग अब सब यही साबित करने पर तुले हैं| जब सारी दुनिया ही माया-मिथ्या है तो फिर क्यों इतना घनघोर आडम्बरी धर्माचरण-  कबीरदासजी की बात को किसी ने आगे बढाया है,
 “जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान
कितने सुधरेंगे हम सब, कर कर के स्नान|”
  मुकेश जोशी
६१, मानसरोवर कालोनी, श्रीरामनगर के पीछे, इंदौर रोड,
उज्जैन ४५६०१०
-    ०९९२६३-००९७३
============================================ 
लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक. ============================================

कोई टिप्पणी नहीं: