मोक्ष मांगती मोक्षदायिनी
मुकेश जोशी
उज्जयिनी की जीवन रेखा 'क्षिप्रा' नदी को वेद-पुराण-शास्त्रों में मोक्षदायिनी कहा गया है| जब पोथी-पुराणों में कहा गया है, तो हमें तो मोक्षदायिनी मानना ही पड़ेगा न|
इस 'पावन' नदी को क्षिप्रा इसलिए कहा जाता है कि यह तेज प्रवाह से बहने
वाली नदी है| दो तिहाई जिंदगी इसी क्षिप्रा को देखते हुए गुजर गई पर बारिश उसमे भी बाढ़ वाले दिन के अलावा कभी इस पवित्र नदी को बहते नहीं देखा| एक पुराण पवित्र नदी हालांकि व्यंग्य का
विषय नहीं हो सकती लेकिन जब
हमारे कर्णधार ही इसके साथ मजाक करने पर आमादा
हों तो और किया भी क्या जा
सकता है|
जिस 'मोक्षदायिनी' के किनारे सिंहस्थ का महाआयोजन होने
जा रहा है, फिलहाल तो उसे
ही मोक्ष की तलाश है| नदी किनारे बसी
धर्मनगरी पर ३५०० करोड़ खर्च कर दिए जाएँ और पवित्र नदी का पानी महीने भर पहले भी चमन करने योग्य तक न हो, जाहिर है, नदी को तो इन 'अर्थपिशाचों' से मुक्ति चाहिए ही न, जो इस नदी का 'पानी' (अर्थ) अपने घरों में उलीच रहे हैं|
१९- ८०, ९२,
२००४ और अब २०१६ में भी क्षिप्रा शुद्धिकरण की
बात ही चल रही है| कोई आर टी आई कार्यकर्त्ता जानकारी निकाले तो पता
चले कि 'क्षिप्रा शुद्धिकरण' के लिए कब से योजनाएं बन रही हैं, उन पर करोड़ों अरबों
रूपये खर्च कर दिए गए हैं, मगर मजाल कि यह पतित पावन
नदी एक इंच भी शुद्ध हुई हो| जिस
रामघाट पर स्नान करने के लिए लाखों-करोड़ों लोग आते हैं आज तक वहां का पानी भी शुद्ध नहीं किया जा सका बात पूरी नदी करते हैं|
इसी सिंहस्थ के लिए
साधु-महात्माओं के डेरे तम्बू लग गए हैं, अखाड़े जमने लगे हैं, और लगभग सारे
साधुओं की शिकायत आज भी यही है कि क्षिप्रा में नालों का पानी मिलने से
रोका जाए| नेता-अफसर सिंहस्थ की तैयारियों को सालों से स्टेंडअप 'खडकों' (बैठक नहीं) के जरिये
अवलोकित कर रहे हैं, पर नालों का क्षिप्रा से मिलन अब तक नहीं रोक पाए, अब इसमें किसकी क्या
मजबूरी है| ये तो 'आयोजक मंडल' ही जाने, पर क्षिप्रा नदी को मोक्ष की तलाश तो है
ही| उज्जैन में ही रहते रहते अपनी जिंदगी की गाडी 'ढाबा रोड' तक आ पहुची है, मगर क्षिप्रा नदी को
'सदानीरा' बनाए जाने के हुक्मरानों के वादे उनके बाकी वादों की तरह वादे ही
रहे, पक्का भरोसा है! जिस भी दिन यह गाडी 'चक्रतीर्थ' पहुंचेगी तब भी चक्रतीर्थ मोक्षधाम पर
पानी नहीं होगा|
बेचारे बाहर के धर्मालुओं को क्या पता कि 'चक्रतीर्थ घाट' पर भावुक लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार बीच नदी में जाकर कर आते हैं| पर हमारी पुण्य-सलिला उन्हें यह 'डायरेक्ट मोक्ष
सुविधा' इसलिए उपलब्ध
करवा पाती है, कि क्षिप्रा में इस जगह पर ११ महीने हाथ मुंह
धोने जितना पानी भी नहीं होता| क्षिप्रा किनारे चौतरफा घाटों का जाल
बिछा दिया गया है, वहां भी जहां पानी की एक बूँद नहीं रहती, सिंहस्थ तो जैसे
तैसे 'उधार के पानी' से मन जाएगा फिर ये सारे करोड़ों के घाट
रेती-धूल मिटटी घाट होकर रह जायेंगे|
उधार का पानी यूँ लिखा कि पिछला सिंहस्थ 'गंभीर' के जल को क्षिप्रा
में छोड़कर मनाया गया था इस बार सचमुच की पवित्र नदी 'माँ नर्मदा' के जल को क्षिप्रा में मिलाये जाने की 'गंभीर योजना' है| इसे 'पानी का ओवरड्राफ्ट' माना जाए तो कैसा
रहे?
पर फिर भी लाख टके का सवाल क्षिप्रा नदी की तरफ से ही कि - "कब तक मैं दूसरी नदियों के सहारे जीवित रहूंगी, है कोई भगीरथ जो मुझे 'सदानीरा' बनाएगा, कौन मुझे सचमुच मोक्ष दिलाकर मेरा उद्धार करेगा?"
कहते हैं क्षिप्रा में स्नान करना कई जन्मों के पुण्यों के उदय होने
का प्रतिफल है-
" नास्ति वत्स मही पृष्ठे शिप्रायः सदृशी नदी,
यस्यास्तीरे
क्षनान्मुक्तिः किन्चिरात्सेवंतेनवे ||
श्रद्धालुओं को क्या पता कि यहाँ तो शनिचरी सोमवती अमावस्या के स्नान पर्वों पर भी नदी में पानी नहीं होता| फव्वारों से स्नान कर पुण्य अर्जित कर लेते है श्रद्धालु|
कहने को घाटों
पर सूचनाए लिखी हुई हैं –
..... "यहाँ घाट
पर साबुन लगाना और कपडे धोना मना है"
लेकिन हमारे यहाँ तो लिखे हुए को नकारना सबसे बड़ी ख़ुशी का सबब
है. . .
... लोग बाग़ क्षिप्रा में न सिर्फ अपनी भैंसों को रगड़
रगड़ कर स्नान करवाते हैं वरन अपनी दुपहिया-चोपहियों को भी नहला धुला
लेते हैं. . .
... और इसके अलावा भी जाने
क्या क्या धो कर चुपचाप निकल लेते हैं . . . .
और फिर भी कहते हैं क्षिप्रा मोक्षदायिनी नदी है. . . .
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लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक.
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