फेस बुक पर बर्थ डे –मुकेश जोशी |
[नईदुनिया ६ नवम्बर १५ में प्रकाशित]
जब से ये मुआ फेसबुक आया है जिंदगी बस फेसबुक ही बन कर रह गई है| अभी जकरबर्ग दिल्ली आये थे
उनसे 'कैंडी कृष सागा' से आतंकित
फेसबुकियों ने इस महामर्ज को हटाने की मांग
तो की पर
मार्क ने कोई रिमार्क तक नहीं किया इस 'खतरनाक बीमारी'
पर| अगर कभी जकरबर्ग इधर हमारे गांव-खेड़ों तरफ
भी आते तो खाकसार उनसे ये तो पूछ ही लेता कि महाराज
आपने नई पीढ़ी के हाथ में ये कौन सा झुनझुना पकड़ा दिया
जिससे सारी दुनिया ही इस 'चेहरे की किताब' (फेसबुक) में घुसी नज़र आ रही है| जमाने भर की तमाम खुशियां- दुःख, चिन्ताएं,विचार, घटना-दुर्घटनाएं,
सम्मान (जिन्हें पाकर लेखक-कलाकार आज अपमानित महसूस कर रहे हैं)
अपमान (जिन लेखक-कलाकारों को तमाम योग्यताएं रखने के बावजूद सरकारी सम्मान नहीं मिल
सके) सब कुछ फेसबुक पर हाज़िर है बस एक क्लिक पर|
