देश मांगे आज़ादी -मुकेश जोशी
पूरे साढे अडसठ साल हो गए आज़ादी मिले को, पर
हमारा देश आज भी आज़ादी मांग रहा है|
टीवी पर रिसालों में, नेट पर, मोबाइल में हर किसी को आजादी की दरकार है, हर कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा मुंह उठाए
मुट्ठी बांधे आजादी-आजादी चिल्ला रहा है|
मेरे लघु मस्तिष्क में नाना प्रकार की
शंकाओं के हज़ारों कीड़े एक साथ रेंगने लगते हैं
(हालांकि वे आजादी आजादी नहीं चिल्लाते) वे शंकाए भी इन आजादी
अभिलाषियों की तरह सिर उठाने लगती हैं कि अगर आज इस तरह जोर शोर से आज़ादी मांगी
जा रही है तो फिर वो क्या थी जो हमें ४७ में मिली ? हम ४७ से एके ४७ तक आ गए तो भी क्या
आजादी नहीं मिली?
वो क्या थी जिसके लिए बापू अंग्रेजों से जूझते
रहे ?
नेताजी ने आज़ाद हिन्द सेना पता नहीं किस देश की आजादी
के लिए बनाई थी?
सरदार भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु
ने फांसी का फंदा चुनकर और चूमकर किसे आज़ादी दिलाई थी?
अगर हम आज़ाद नहीं हैं, तो फिर ६७ सालों से 'झूठ-मूठ की आजादी' का पर्व मना रहे हैं और यूँ ही 'आन मान में' लाल किले पर तिरंगा फहराया जा रहा है|
इससे ज्यादा क्रूर व्यंग्य क्या हो
सकता है, कि चंद सिरफिरों को हमारे इतने विराट और महान मुल्क की आज़ादी के
मायने ही नहीं मालूम| उन्हें इतना तो पता ही होगा कि हमें न
सिर्फ हुक्मरानों को गरियाने की आज़ादी है वरन इस मुल्क के टुकड़े टुकड़े कर देने की
घोषणाओं की भी आज़ादी है...
... और कितनी आज़ादी चाहिए दोस्तों| पढने-पढ़ाने के लिए बाप-मां द्वारा कॉलेज-यूनिवर्सिटी
भेजे जाने वाले 'विद्यार्थी' सरेआम 'विद्या की अर्थी' निकाल रहे हैं और....
... पढ़ाई के अलावा उन्हें सारे 'नैतिक-अनैतिक' कृत्यों की आजादी है ...
... ज्यादातर 'शिक्षा परिसरों' को दारुबाज़ी और अय्याशियों के 'घोटुल' बना दिए जाने की आजादी मिली हुई है| ...
... लाख लाख रूपये लेने वाले प्रोफेसरों
को 'क्लास
रूम' तक
का पता नहीं होता क्योंकि उन्हें न पढ़ाने की आज़ादी है...
... और छात्रों को तो न पढने का
जन्मसिद्ध अधिकार मिला हुआ है ही.. |
दोस्तों आपको रोज हड़ताल की आज़ादी है, धरने- प्रदर्शन की आज़ादी है|
आज़ाद पंछी की तरह उड़ते मेरे लघु
मस्तिष्क में फिर यह शंका उपजती है कि हम तो गुलामी के दिनों में भी कभी गुलाम
नहीं रहे....
.... जहां मन हुआ वहां दीवार की तरफ मुंह करके खड़े होते रहे, जहां मन हुआ (प्रेशर बना) अधोवस्त्र
आधा सरका कर बैठ गए| ..... मुंह उठाया और थूक दिया|
वो सिलसिला आज तक नहीं थमा हमने सारे मुल्क
को "जहां सोच वहां शौचालय" बना कर रख डाला है, हमारी ये
'मौलिक
आजादी" आज तक बरकरार है|
तो इससे ज्यादा और कैसी आजादी चाहिए हमें?
देश में चाहे जब और चाहे जहां खाने-पीने
और हगने- मूतने की आजादी मिली रहे, आजादी के असली मायने यही तो हैं|
हमें दादरी- हैदराबाद की सिंगल मौतों
पर राष्ट्रव्यापी स्यापा करने की आजादी है,
हमें कश्मीर में रोज शहीद होने वाले
जांबाज़ सैनिकों की मौत पर जरा भी शोक न करने की आजादी है|
देश में रहकर देश का खाकर देश को रात दिन
गालियां देने की आजादी है|
सरकारों से विज्ञापन लेकर चेनल/ अखबार
चला रहे पत्रकारों को देश के खिलाफ सतत जहर उगलने
की आजादी है|
कथित साहित्यकारों-कलाकारों को पुरस्कार
लौटाने का प्रचार करने की आज़ादी है|
चोरों को चोरी करने, डाकुओं को डकैती करने, घूसखोरों को घूस लेने, हर नुक्कड़ चौराहे पर शोहदों को बालिकाओं
से छेड़छाड़ करने, गुंडों
को कार-बस, खेत-खले, जंगल कही भी बलात्कार करने, लूट-हत्या करने, चंदाखोरो को सरकारी जमीन पर जबरन भगवानो/ मजार
का अतिक्रमण करवाने, छुटभैया
नेताओं को गुमटी लगवाने, बीच सड़क पर भोजन-भंडारे करवाने,
बारातियों
को डांस के लिए सड़क जाम करने, नेताओं को घोटाले करने, अफसरों को इन घोटालों में शामिल होने, अधिकारी- कर्मचारियों को मक्कारी करने, अदालतों को तारीख पे तारीख देने,
ठेकेदारों-इन्जीनियरों
को सड़क,पुल,
बाँध,बिल्डिंग निगल जाने और उस पर
भी डकार तक न लेने तक हर बात की आजादी तो खुलकर मिली हुई है|
छाती ठोककर आजादी मांगने वाले इन युवाओं से काश कोई
यह पूछे कि देश ने आपको इतनी आजादी दी है कि आप पलट कर देश को गालियाँ
दे सके|
इसके अलावा देश को आपने दिया क्या है,
दूसरे मुल्क की गुलामी के दीवानों .... ?
-मुकेश जोशी
६१, मानसरोवर
कालोनी , श्रीराम
नगर के पीछे, उज्जैन ४५६०१०
-०९९२६३-००९७३
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लेख विषयक प्रत्येक बात के लिए लेखक स्वयं उत्तर दाई है| संपादक.
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